Saturday, February 23, 2019

बुरांश फूल के फायदे जानकार हैरान रह जायेंगे आप


पहाड़ों  में कई तरह की जड़ी—बूटिंया पाई जाती हैं। इसके अलावा यहां पर एक एैसा फूल पाया जाता है जो हमें कई बीमारियों से बचा सकता हैं यानि की औषधियुक्त पौधा। उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल विश्व की तीन एक मात्र एैसी जगह हैं जहां बुंरास का आयुर्वेदिक पौधा मिलता है। कई रंगों में पाया जाने वाला ये फूल बहुत से गुणों से भरपूर होता है। इस फूल के जूस से आप कई गंभीर रोगों से बच सकते हो। समुद्र तल से 3500 मीटर उंचे पहाड़ी इलाकों में ये फूल गर्मियों के मौसम में उगता है।
आयुर्वेद में भी जिक्र किया गया है इस फूल का। लाल रंग वाला बुंरास में सबसे अधिक स्वास्थवर्धक गुण पाए जाते हैं। ये फूल केवल विशेष मौसम में ही होता है। उस समय इसकी मांग खूब बढ़ जाती है।

अब आपको बताते हैं बुंरास के फूल का जूस पीने के फायदों के बारे में-

जो लोग खासकर की दिल की बीमारी या फिर किड़नी में होने वाली दिक्कत से ग्रसित हों वे इस जूस का सेवन नियमित करें। इससे इन रोगों से छुटकारा पा लेगें।


खून की कमी

इस फूल के रस में विटामिन ए के अलावा विटामिन बी—1 और बी—2 भी होता है। जो इंसान के शरीर में एनिमया यानी खून की कमी को दूर करता है। ये लाल पहाड़ी फूल वजन को बढ़ने से रोकता है।


हड्डियों का दर्द

उम्र जैसे—जैसे बढ़ती है हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। साथ ही दर्द का होना भी स्वभाविक हो जाता है। ऐसे में यदि आप नियमित होकर बुंरास का जूस पीते हो तो कुछ ही दिनों में आपका ये दर्द ठीक हो जाएगा।


स्किन से जुड़ी समस्याएं

इस फूल से बनने वाला शर्बत को यदि आप नियमित पीते हैं तो इससे आपकी त्वचा साफ होगी। इस जूस में एंटीआॅक्सीडेंट होते हैं जो
दिमाग को भी शां​त रखते हैं।

ब्लड प्रेशर की समस्या

दिनों दिन ये समस्या आम होती जा रही है लेकिन इससे होने वाले नुकसान भी बहुत हानिकारक होते हैं। यदि आपका रक्तचाप यानि ब्लड प्रेशर हमेशा हाई रहता हो तो आप जरूर इस फूल के जूस का सेवन करें। इससे ये समस्या जड़ से ठीक हो जाएगी



शरीर में आयरन की कमी 

वे लोग जिनके शरीर में आयरन तत्व यानी की लौह की मात्रा कम हो गई हो वे बुंरास का जूस या शर्बत जरूर पीएं। इससे शरीर
बीमारियों से लड़ने में भी सक्षम हो जाता है।

चटनी

दोस्तों ये फूल केवल बीमारियों को ठीक नहीं करता इसके अलावा भी आप इसका सेवन चटनी के रूप में भी कर सकते हो। इसके स्वादिष्ट चटनी बनती है जो पोषक तत्वों से भरपूर होती है।

हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए कोटद्वार के रास्ते से ही गए थे।




श्री सिद्धबली धाम कोटद्वार में बाबा की चौखट से कोई भी श्रद्धालु निराश नहीं लौटता है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है। मनोकामना पूरी होते ही भक्त मंदिर में भंडारा कर हनुमान जी को भोग लगाते हैं। श्रद्धालुओं पर बजरंग बली की नेमत इस कदर बरसती है कि यहां भंडारा आयोजन के लिए भक्तों को सालों साल इंतजार करना पड़ता है। धाम में अगले सात वर्षों यानी 2025 तक भंडारों की एडवांस बुकिंग चल रही है।



कोटद्वार स्थित श्री सिद्धबली धाम हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। बजरंग बली जी के इस पौराणिक मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण में भी है। श्री सिद्धबली बाबा के दर्शन को देश एवं विदेश से श्रद्धालु यहां उमड़ते हैं और मंदिर में मत्था टेककर मनोकामना मांगते हैं। बाबा अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते। मुराद पूरी होने के बाद श्रद्धालु मंदिर में भंडारा कर भोग लगाते हैं।
श्री सिद्धबली धाम की ख्याति देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक है। हर साल लाखों भक्त देश एवं विदेश से धाम पहुंचते हैं। भंडारा बुकिंग काउंटर के शैलेश कुमार जोशी बताते हैं कि भंडारे की एडवांस बुकिंग कराने वाले श्रद्धालु उत्तराखंड के अलावा यूपी, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र से हैं। कई एनआरआई भी हैं, जिनकी मुराद धाम में आने पर पूरी हुई है। श्री सिद्धबली धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष कुंज बिहारी देवरानी के मुताबिक श्री सिद्धबली धाम गुरु गोरखनाथ जी की तपस्या स्थली रही है। आदिकाल में मंदिर स्थल पर सिद्ध पिंडियां थीं। 80 के दशक में मंदिर में बाबा की मूर्ति स्थापित हुई। इसके बाद ही मंदिर का सुंदरीकरण हुआ। कहा जाता है कि हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए इसी रास्ते गए थे।

Thursday, February 21, 2019

खुशखबरी ! बौंसाल पुल का हो रहा है निर्माण











विकास खंड कल्जीखाल के अंतर्गत बडखोलू मोटर पुल की लागत 17 करोड़ व बोंसाल मोटर पुल की लागत 10 करोड़ की वित्तीय स्वीकृति मिलने के पश्चात विश्व बैंक की टीम द्वारा सर्वेक्षण का कार्य किया गया। इन दोनों पुलों की निर्माण की क्षेत्रीय जनता की वर्षों पुरानी मांग और चुनाव के समय माननीय विधायक जी द्वारा क्षेत्रीय जनता से इन दोनों पुलों को बनाने का अपने वादे को पूरा करने के लिए माननीय विधायक श्रीमान मुकेश कोली जी का हार्दिक आभार।।

जाने बौंसाल पुल के बारे में 


Friday, February 1, 2019

सतपुली






सतपुली मेरठ-पौड़ी राजमार्ग पर एक शहर है, जो कोटद्वार से लगभग 50 किलोमीटर और पौड़ी से 50 किलोमीटर की दूरी पर, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित है।
 
सतपुली नयार (पूर्व) नदी के दक्षिणी किनारे पर और नयार (पूर्व) और नायर (पश्चिम) नदियों के संगम से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह बाणघाट से भी जुड़ा हुआ है, जहां पर एकीकृत नायर नदी गंगा नदी से मिलती है। सतपुली, पौड़ी गढ़वाल जिले के सतपुली शहर के ब्लॉक कार्यालय के साथ है। सतपुली ब्लॉक में 263 गांव शामिल हैं।  यह पौड़ी से 52 किमी और कोटद्वार से 54 किमी दूर है।
 
 
ऐसा कहा जाता है कि सतपुली का नाम इस तथ्य से पड़ा है कि कोटद्वार के रास्ते में इसके सात पुल (साट-पुल) हैं। कुछ दशक पहले तक यह स्थान एक खेत हुआ करता था। धीरे-धीरे, कुछ झोपड़ी जैसी दुकानें नदी के दूसरे किनारे पर फैल गईं। 1951 में सतपुली में बड़े पैमाने पर बाढ़ देखी गई, जिससे जान-माल की हानि हुई और उस साल कई लोगों की मौत हो गई। कुछ दुकानें और नोट-योग्य इमारतें जैसे जी.एम.ओ.यू का कार्यालय। प्रा। लिमिटेड बह गया था। बाद में, दुकानदारों को वर्तमान स्थान पर बसाया गया। नयार नदी के बड़े बाढ़ में मारे गए लोगों की याद में जल विद्युत स्टेशन पर एक स्मारक बनाया गया है। सतपुली अपने माचा भट (मछली की सब्जी और चावल) के लिए प्रसिद्ध है और यात्रियों के लिए एक पड़ाव / विश्राम स्थल के रूप में है जहाँ उनका दोपहर और रात का भोजन कोटद्वार, पौड़ी, श्रीनगर या नैया घाटी के उच्चतर स्थानों तक पहुँचता है। अब यह एक टाउन एरिया है।
 
सतपुली मछली पकड़ने के लिए एक आदर्श स्थान है क्योंकि नयार (पूर्व) और नयार (पश्चिम) दोनों नदियाँ अलग-अलग मछलियों से भरी हुई हैं। इन दोनों नदियों के संगम के बाद मछलियों की विविधता और संख्या और बढ़ जाती है। जलीय जंतुओं की एक भीड़ के अलावा, मीठे पानी की ईल (गढ़वाली के रूप में जानी जाती है), चित्तीदार कैटफ़िश की एक स्थानीय किस्म (गढ़वाली में काना के रूप में जानी जाती है) और अंचल (एक प्रकार की नदी कार्प) प्रसिद्ध हैं। केकड़े, नदी सांप, ऊदबिलाव, पानी के पक्षी और पेरिविंकल्स भी देखे जा सकते हैं। आसपास के इलाके, नदियों की खोज और प्रकृति के स्थलों का आनंद लेने के अलावा, वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यहां किया जा सकता है। इसके अलावा, आसपास के पर्यटन स्थलों का दौरा किया जा सकता है। लैंसडाउन, जो शायद सबसे शांत, सबसे साफ और सबसे कम भीड़ वाला हिल-स्टेशन है, यहां से केवल 30 किलोमीटर दूर है। पहाड़ी रास्तों से घुमावदार होकर यह 1 घंटे का आनंददायक सफर है और जब आप सतपुली में 2200 फीट से लेकर लैंसडाउन में 6000 फीट की ऊंचाई पर चढ़ते हैं, तो आप जलवायु में भारी बदलाव महसूस कर सकते हैं। लैन्सडाउन को जंगल सफारी के लिए भी जाना जाता है। फिर भी, एक बात है जो अब तक की संख्या, अर्थात् मंदिरों में दूसरों से अधिक है। उत्तराखंड और पौड़ी जिले में मंदिरों की कोई कमी नहीं है।  ज्वाल्पा देवी मंदिर , भुवनेश्वरी देवी मंदिर (नायर और गंगा के संगम के पास), भैरव गढ़ी (7200 फीट की ऊंचाई पर मध्ययुगीन गढ़वाली किले और मंदिर) की यात्रा कर सकते हैं। सतपुली रामलीला, ग्रिश्मोत्सव, शरदोत्सव और कई उत्सवों का जश्न मनाता है, जो लोगों की भीड़ से मिलते हैं। ज्वाल्पा देवी मंदिर सतपुली का प्रसिद्ध मंदिर है जो पौड़ी की सड़क पर स्थित है जो सतपुली से लगभग 19.2 किमी दूर है।