साथियों जैसे कि  आप जानते हैं कि
कोरोना वायरस ने पूरे विश्व में आतंक कर रखा है और बीमारी से बचने के लिए लोग कई तरह के उपाय कर रहें हैं कोई सेनेटाइजर का इस्तेमाल कर रहा है तो कहीं सरकार सबको हाथ धोने के लिए कह रही है तो
इस जल संकट के कारण सूखाग्रस्त होने की अधिक सम्भवना
जैसे कि आप जानते हैं भारत ही ऐसा देश जहां सबसे अधिक वर्षा होती है लेकिन यहां पर जलसंग्रहण की व्यवस्था  बिल्कुल ना के बराबर है वर्षा में बहने वाला जल सिंचित नहीं किया जाता 
वहीं सऊदी अरब जैसे देश जहां पर वर्षा बहुत निम्न है फिर वहां जलसंग्रहण करने के पुरी व्यवस्था है जिससे वहां पर जल संकट कभी नहीं गहराता है 
भारत एक बहुत बड़ी अर्थव्यस्था है लेकिन हाल के ही संकट कालीन स्थिति कोरोनो के भय से अर्थव्यस्था में काफी नुकसान है


आज हमें एक जुट होकर अंतर्मुखी बनकर इस बीमारी को जड़ से हटाना होगा जिससे आने वाले दशक में हम समृद्ध राष्ट्र बने 

हमे अधिक सफाई पर ध्यान देकर उच्च पोषण उक्त आहार लेकर अपने आप को सुरक्षित रखना होगा साथ ही 
दयालु स्वभाव रखकर मांस-मदिरा से दूर रहना होगा क्योंकि ना जाने कितने घातक विषाणु हर तरह के जानवर में हो सकते हैं 
जिसका उदाहरण ये महामारी है

और साथ ही डिजिल पेमेंट को बढ़ावा दे जिससें देश कैशलेस हो क्योंकि विषाणु का खतरा नोटों और सिंक्कों पर भी है क्योंकि ये कई हाथों से होकर गुजरते हैं

आईये हम इस संकट की घड़ी में शांत, सुरक्षा और सतर्क रहें और वर्ष जल को संग्रहण पर बढ़ावा दे और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं अपने घरों के आसपास वातारण को शुद्ध करने वाले पौधे लगाएं तुलसी वगरैह जिससे विषाणु हवा में ही खत्म हो जाएं

धन्यवाद
ये लेखक के अपने विचार है
दोस्तों मैंने बहुत पहले कहा था कि एक दिन पहाड़ से पलायन करने वाले लोग एक दिन जरूर वापस आएंगे
क्योंकि मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधन खत्म कर दिए
कई कीमती प्रजाति जैसे मधुमखियाँ और तितलियां विलुप्ति के कगार पर हैं जो परांगण के लिए उत्तरदायी थे
जिसका कारण केवल मनुष्य है उसने अपने स्वार्थ के कारण प्रकृति का जीना हराम कर दिया याद रखें पेड़ पौधे और पशु पक्षी प्रकृति का ही अंग है लाखों पेड़ काटे गये लेकिन किसी ने एक भी पेड़ नहीं लगाया स्त्रोत सूखते गए और लोग इंटरनेट और पाश्चात्य दुनिया के पीछे भागते गए , लोगों इतने निर्दयी हो गए जीव हत्या करते गए उसका परिणाम कभी बेमौसम बरसतब, जब जरूरत हो तब नहीं होना , अत्यधिक गर्मी या ठंडी सब वैश्विक ताप का ही परिणाम है

लाखों अरबों टन कार्बन का उत्सर्जन इसी का कारण है
क्योंकि इनपुट ज्यादा है आउटपुट कम , कार्बन उत्सर्जन,ग्रीन हाउस गैस को रोकने वाले जीवनदायी पेड़
तो कटे जा रहे हैं मनुष्य की भोग विलासता के कारण
मनुष्य हमेशा अपनी सोचता है प्रकृति का उसने कभी भला नहीं किया

 दूसरा अधिक गाड़िया लाना भी इसका बहुत बड़ा कारण  
एक गाड़ी में 50 लोग आ सकते हैं लेकिन यहां 50 लोग 50 अलग अलग गाड़ी लाएंगे और प्रदूषण को बढ़ाने और भीड़ करने , भाई पैसा तुमने ही देखा है क्या?

लाखों पेड़ो की बलि , लाखों जीवों की हत्या कि प्रकृति त्राहिमाम् त्राहिमाम कर रही हैं जिससे अभी तो लोग महामारी से घर वापस आ रहे हैं एक दिन ऐसा आएगा 
कि इतनी भयंकर गर्मी पड़ेगी इतना ज्यादा प्रदुषण हो जाएगा कि जीना मुश्किल हो जाएगा 
और जैसा बताया कि संसाधन खत्म हो रहा है सब्जि अनाज नहीं मिलेगा तो लोग भाग कर अपने पहाड़ जरूर वापस आएंगे

अमित रावत की कलम से
आपसी प्यार और रंगों के त्यौहार होली को चमोली जिले के गोपेश्वर शहर के भगवान गोपीनाथ की चौकठ के सामने सभी लोगों ने होली को बड़ी धूम-धाम से मनाया , वीडियो देखें








दोस्तों क्या आप जानते हैं कई पौधे जो हमारे आसपास होते हैं लेकिन हमें उनके बारे में पता नहीं होता कि इसके भी फायदे होते हैं


तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसा पौधा जो उत्तराखंड में बहुत पाया जाता है लेकिन हमें पता नहीं होता कि इसको खाया जाय या नहीं


वो है बसिंग्गा , जी हां यही है वो पौधा है
जिसकी सब्जी केवल सर्दियों में ही बनती हैं
क्योंकि गर्मियों में इसकी सब्जी नुकसानदेह हो सकती है क्योंकि ये काफी गर्म होती है शरीर के लिये

इसकी सब्जी बनाने के लिए नाजुक नाजुक पत्तियां तोड़ी जाती है जिसमें जख़्या का तड़का लगा कर सब्जी बनायी जाती है जो खाने में बड़ी ही स्वादिष्ट होती है

अब जानते हैं इसके लाभ-
इसको खाने से हड्डियां मजबूत होती हैं
अगर किसी को वायु विकार हो या घुटनों में तकलीफ हो तो वो इसका सेवन कर सकता है
अगर किसी को शारीरिक कमजोरी हो तो वो भी इसका सेवन कर सकता है
लेकिन ध्यान गर्मियां शुरू होते है इसका सेवन बन्द कर देना चाहिए और अधिक सेवन से बचना चाहिए

कहने का अभिप्राय है कि इसकी सब्जी केवल ठंड़ीयों में खानी चाहिए लेकिन रोज नहीं 


इसके सेवन से शरीर मजबूत बनता है और हर प्रकार के दर्द से निजात मिलती है


इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि शुगर के मरीजों के लिए भी बहुत फायदेमंद है


देवप्रयाग में रघुनाथजी मंदिर, उत्तराखंड के उत्तर भारतीय राज्य हिमालय में टिहरी गढ़वाल जिले का एक तीर्थस्थल है, जो विष्णु को समर्पित है। यह ऋषिकेश से 73 किमी की दूरी पर ऋषिकेश - बद्रीनाथ राजमार्ग पर स्थित है। 


इस मंदिर के बारे में यह कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 10,000 साल पहले किया गया था | यह मंदिर चार अन्य छोटे मंदिरों अन्नपूर्णा देवी, न्रर्सिंह, हनुमान गुफा और गरुड़ महादेव से घिरा हुआ है |
आईये जानते है देवप्रयाग के बारे में

देवप्रयाग :-
अलकनंदा तथा भगीरथी नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान पर  स्थित है। इसी संगम स्थल  के उपरांत दोनों नदियों के संगम के बाद इन्हें गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग की ऋषिकेश से सडक मार्ग दूरी ७० किमी० है। गढवाल क्षेत्र में भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर है, जो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देते, जो की एक आश्चर्य की बात है। स्कंद पुराण केदारखंड में इस तीर्थ का विस्तार से वर्णन मिलता है कि देव शर्मा नामक ब्राह्मण ने सतयुग में निराहार सूखे पत्ते चबाकर तथा एक पैर पर खड़े रहकर एक हज़ार वर्षों तक तप किया तथा भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन और वर प्राप्त किया।




                 
                     "ओम नमो नारायणाय"






यूँ तो सन् 1887 में गोरखा राइफल्स की एक टुकड़ी रानीखेत से पैदल चलकर लैंसडाउन पहुंची थी और इसी सन में यहाँ गढ़वाल राइफल्स की स्थापना हुई थी। जिसका श्रेय जितना  लार्ड लैंसडाउन को जाता है जिसके नाम से कालौं-डांडा का नाम लैंसडाउन पडा है उतना ही श्रेय  कल्जीखाल विकास खंड के हैडाखोली गाँव के बलभद्र सिंह नेगी जी को भी जाना चाहिए जो उस समय में एडीसी टू वायसराय इन इंडिया एंड इन ब्रिटेन रहे। ये उन्हीं के प्रयास रहे कि सन् 1905 में दुगड्डा तक मोटर सडक निर्माण किसी निजी ठेकेदार ने नहीं बल्कि गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट ग्रुप द्वारा निर्मित है और दुर्गादेवी की स्थापना भी उन्हीं के द्वारा की गयी है।
इस सड़क निर्माण के लिए कोटद्वार के एक बेहद अमीर व्यवसायी #सूरजमल ने उस समय बहुत मदद की थी ।इस सडक पर पहला वाहन दुगड्डा के व्यवसाई मोतीराम का आया था जिस में  कई बोरे गुड, चना, भेली व नमक पहली बार लाया गया था और इस गाडी को देखने के लिए उस दौर में लगभग 15 हजार लोग दुगड्डा में मौजूद थे।
सन् 1909 तक यही सडक मार्ग  पूरा होता हुआ लैंसडाउन जा पहुंचा और पहाड़ की उंचाई पर पहली बार सडक सन् 1909 में पहुंची जिससे ढाकरी मार्ग कई जगह से टूटा और बदलपुर तल्ला और मल्ला से लेकर राठ यानि बीरोंखाल तक जाने वाले ढाकरी मार्ग में ढाकरी के लोगों को आने जाने में सरलता होने लगी। भले ही बीरोंखाल इलाके के बहुत कम लोग दुगड्डा सामान लेने आते थे क्योंकि उन्हें मर्चुला सराईखेत होकर रामनगर मंडी नजदीक पडती थी।
बुजुर्गों का मानना है कि यूँ तो सडक 1925-26 तक सतपुली पहुँच गयी थी लेकिन इसमें आम आदमी को गाड़ी में सवार होने की अनुमति नहीं थी, सिर्फ गढ़वाल राइफल्स के #ब्रिटिशअधिकारी व #पौड़ीकमिश्नरी के आला अधिकारी ही सतपुली तक ट्रोला या लौरी गाडी में सवार होकर यहाँ तक पहुँचते थे जिनके लिए एक अलग सी घोड़ा खच्चर सडक बांघाट -बिल्खेत, ढाडूखाल, कांसखेत, अदवाणी होकर पौड़ी के लिए बनाई गयी थी, इस पर सिर्फ अंग्रेज अधिकारी ही चल सकते थे या फिर उनके साथ भारतीय गुलाम व राजस्वकर्मी रहते थे ।जबकि आम भारतीय के लिए इसी रूट से होती हुई ढाकरी सडक थी जिस से तिब्बत तक व्यापार होता था । कठिन मेहनत से इसके लगभग 12 साल बाद यानि सन् 1932 तक नयार में एक लकड़ी पुल बनाकर बौंशाल, अमोठा पाटीसैण से होती हुई सडक पर ज्वाल्पा नयार पर एक पुल बनाया गया फिर ज्वाल्पा, जखेटी, अगरोड़ा, पैडूल, परसुंडाखाल होकर सडक घोड़ीखाल पहुंची । जहाँ एक समय घोड़ों का अस्तबल होता था और आखिरकार बुबाखाल होती हुई यह सडक पौड़ी जा पहुंची जिसमें गढ़वाल कमिश्नर #काम्बेट ने पहली यात्रा मोटर लौरी से की जो गढ़वाल राइफल्स का उस काल की गाडी मानी जाती थी ।लेकिन गढ़वालियों का दुर्भाग्य देखिये उन्हें तब भी पैदल ही चलना होता था। क्योंकि इस सडक निर्माण के बाबजूद भी इसपर मोटर वाहन बर्षों तक संचालित नहीं हो पाए, अंग्रेज अफसर या फिर राय बहादुर राय साहब की उपाधि से सम्मानित माल गुजार, थोकदार व अंग्रेज अफसरों के सरकारी दफ्तरों के पटवारी तहसीलदार ही इन सड़कों पर घोड़े में सवार होकर जा सकते थे। इसे सौभाग्य ही समझिये कि सन् 1942 तक आखिर यह तय हुआ कि जो कोई भी गढ़वाली उद्यमी या फिर आम व्यवसायी अपने निजी वाहन लेकर इस मार्ग में चल सकता है उसे इजाजत है। बर्ष 1943 में वाहन स्वामी दुगड्डा मोतीराम व सूरजमल कोटद्वार वालों ने साझा वाहन खरीदा जिसे कफोलस्यूं के पयासु ग्राम निवासी राजाराम मोलासी (मलासी) द्वारा पहली बार कोटद्वार-सतपुली- पौड़ी मोटरमार्ग पर चलाया गया। जिनकी हर स्टेशन पर हजारों लोगों ने फूल माला पहनाकर स्वागत किया था।बुजुर्गों का कहना है कि यह  गाडी दो दिन में सफर कर जब अगरोड़ा पहुंची तो वहां किसी महिला द्वारा गाडी के आगे घास व पानी रखा गया कि बेचारी भूखी होगी। कितने भोले लोग रहे होंगे वो, कितना सरल मन था उनका। उनको मेरा शत् शत् नमन।
आपको बता  दूँ कि 30 दिसम्बर सन् 1815 में राजा गढ़वाल सुदर्शन शाह द्वारा जहाँ टिहरी को अपनी राजधानी बनाया गया वहीँ इस से पहले ब्रिटिश गढ़वाल वह अंग्रेजों को हस्तगत कर चुके थे व अंग्रेजों द्वारा अक्टूबर सन् 1815 में ही पौड़ी कमिश्नरी की स्थापना कर पहले डिप्टी कमिश्नर के रूप में डब्ल्यू जी ट्रेल को नामित किया जो बाद में यहाँ कमिश्नर बने। तत्पश्चात बैटन बैफेट कमिश्नर हुए उसके बाद सबसे अधिक कार्यकाल हैनरे रैमजे का हुआ जो 1856 से लेकर 1884 तक गढ़वाल-कुँमाऊ के कमिशनर रहे और इन्हें नैनीताल में रामजी के नाम से जाना जाना था,तत्प्श्चात्त कर्नल फिशर, काम्बेट व अंतिम गढ़वाल कमिश्नर पॉल हुए । सन् 1941 में कमिश्नर काम्बेट या पॉल ने 30 मोटर गाडियों के जखीरे को परमिशन देते हुए वाहन स्वामियों के लिए आदेश निकाले की वे गढ़वाल मोटर्स यूनियन का गठन करें ।आखिर मोटरयान अधिनियम 1940 की धारा 87 (अब संशोधित 1988 की धारा 87) के अंतर्गत यूनियन का गठन हुआ और वाहन स्वामियों ने राहत की साँस ली। फिर वह दिन भी आया जब 14 सितम्बर 1951 में सतपुली बाढ़ में  22 मोटर बसें, ट्रक व लगभग 30 मोटर ड्राईवर कंडक्टर इस नयार की भेंट चढ़े। इनमें उस मोटर या लौरी का ड्राईवर भी शामिल था जो पहली बार पौड़ी पहुंची थी। उनका नाम कुंदन सिंह बिष्ट ग्राम- चिन्डालू , पट्टी-कफोलस्यूं पौड़ी गढ़वाल था।


पहाड़ी स्कॉश के हैं कई फायदे

पहला इसकी सब्जी बड़ी अच्छी बनती है

दूसरा इसके परांठे भी बनते हैं जो कि बहुत सेहतमंद है


इसके खाने से कई विटामिन्स मिलते हैं साथ ही
यह पेट के लिए भी अच्छा होता है
पहाड़ो में यह बहुतायात में पाया जाता है


इसकी सब्जी बड़ी ही स्वादिष्ट होती हैं और विटामिन्स और खनिज से भरी है
इसमे आयरन भी होता है
साथ ही कई मिनरल्स होते हैं







गंगा नदी भारत की करीब 43% जनसंख्या का बोझ अकेले उठाती है|  समूचे विश्व में गंगा ही एक ऐसी नदी है जिसका पानी कभी खराब नहीं होता| भारत के करीब आधी जनसंख्या का पालन-पोषण करने के बाद भी गंगा नदी की हमने ऐसी उपेक्षा की कि आज यह विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी है| उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा नदी को मानवीय अधिकार प्रदान किए जिससे गंगा का अस्तित्व बचा रह सके| गंगा नदी के मानवीकरण का जो कार्य न्यायालय ने अब किया है वही कार्य हमारे पूर्वज आज से हजारों वर्ष पहले ही कर चुके थे|
      हमारे पूर्वजों ने हमारी ऐसी संस्कृति विकसित की थी कि हमारे सारे रीति-रिवाजों, पर्व-त्योहारों, उत्सवों, व्रतों आदि का प्रकृति एक अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी| शायद ही कोई ऐसा व्रत हो जो तालब-नदी या पेड़-पौधों के बिना पूर्ण होता हो| शादी-विवाह में पनभरन की एक रस्म निभाई जाती है जिसमें ढोल-बाजे के साथ गीत गाते हुए कुएं या तालाब जैसे जलाशय पर जाकर मटके में पानी भरना होता है| इसके बाद आमौर ब्याहने की रस्म निभाई जाती है जिसमें इसी तरह से गाजे-बाजे के साथ आम के पेड़ के साथ शादी की जाती है|
      बात यह है कि हमारे पूर्वजों ने तो हर तरीके से हमें प्रकृति के साथ जोड़े रखने का प्रयास किया परंतु हम कभी समझ नहीं पाये जिसका परिणाम आज हमें भुगतना पड़ रहा है| तालाब और कुओं का महत्त्व हमने समझा होता तो आज भूमिगत जल-स्रोत इतना कम ना हुआ होता| पेड़ के महत्त्व को हमने समझा होता तो आज वायु-प्रदूषण की स्थिति इतनी भयावह न हुई होती|



कल रविवार को न्यूज़ीलैंड बनाम इंग्लैंड के फाइनल मतकग हुआ जिसमें दोनों का स्कोर 241 था
बाद में आई सी सी ने इंग्लैंड को विश्व कप का विजेता चुन लिया

गौरतलब है कि हर बार इंग्लैंड रनर अप में आ जाता था लेकिन
इस बार मुकाबला बराबरी का था
जिससे सुवर ओवर की वजह से इंग्लैंड जीत गया



सुपर ओवर के नियम


  • दोनों टीमें खेलेंगी छह-छह गेंदे
  • दोनों टीमें तीन बल्लेबाज़ों को इस्तेमाल कर सकती हैं
  • सबसे ज़्यादा स्कोर बनाने वाली टीम जीतेगी


सारांश

  1. न्यूज़ीलैंड को हराकर पहली बार विश्व चैंपियन बना इंग्लैंड
  2. बेहद रोमांचक रहा मैच सुपर ओवर तक खिंचा
  3. 23 साल बाद वनडे वर्ल्ड कप को मिला नया चैंपियन
  4. पिछले विश्वकप की उपविजेता है न्यूज़ीलैंड की टीम



















उत्तराखण्ड में जरूरतमंद लोगों और गंभीर से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए वरदान साबित हो रहे द हंस जरनल अस्पताल सतपुली में समाजसेवी माताश्री मंगलाजी एवं भोलेजी महाराज की प्रेरणा से 5 जुलाई से 7 जुलाई 2019 तक निःशुल्क स्त्री रोग जांच क्लिनिक का आयोजन किया गया। जिसमें नयारघाटी व दूर दराज के ग्रामीणों सहित हजारों की संख्या में पहुंचे स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य लाभ उठाया।

माताश्री मंगला जी एवं श्री भोले जी महाराज ने पहाड़ की महिलाओं के संघर्षों को बहुत करीब से जानते हैं । उन्हीं के मार्गदर्शन से  हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल में महिलाओं के लिए विशेष तौर पर इस शिविर का आयोजन किया था।
क्योंकि वो जानते हैं कि पहाड़ की महिलाओं का जीवन बहुत संघर्ष पूर्ण और जोखिम भरा होता है 
पहाड़ की नारी अपने खेत-खलिहानों और पशुओं के लिए अपना जीवन तक दाव पर लगा देती है। 
जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं आई और उन्होंने अपने स्वास्थ्य की जांच कराई। 

इस शिविर में खून, यूरीन, अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, सीटी स्कैन सहित निःशुल्क दवाइयों का वितरण भी किया गया। शिविर में चौबट्टाखाल, संगलाकोटी, रीठाखाल, एकेश्वर, सतपुली, बिलखेत, बडियूँ, कांसखेत, कल्जीखाल, पटीसैन, गवाना, दुधारखाल,ज्वालपा देवी और संतुधार  आदि ग्रामों से बड़ी संख्या में महिलाएं अपने स्वास्थ्य जांच के लिए पहुंची। इस मौके पर इन तमाम ग्रामों से आई महिलाओं ने द हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल में विशेष तौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य जांच के लिए इस शिविर का आयोजन करने के लिए माताश्री मंगला जी एवं श्री भोले जी महाराज और हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल के डाक्टर एवं सदस्यों का कोटि-कोटि आभार व्यक्त किया
श्रीमान_विध्यादत्त_शर्मा_उनियाल


वर्तमान की भौतिकवादी मानसिकता हर जन की गांव-समाज से विमुखता को दरकिनार करते हुए 83 वर्षीय वैचारिक नौजवान परम् आदरणीय विध्यादत्त शर्मा उनियाल सांगुड़ा कल्जीखाल विकास खंड ने श्रम-साधना की अवधारणा ,पर्यावरण संरक्षण और श्रम से निरोग रहने की महत्ता को जिस संजीदगी से प्रस्तुत किया है वो युगों-युगों तक इस आदम समाज को प्रेरणा देता रहेगा
इन्होंने उस क्षेत्र में अपनी जीवटता दिखाई जहां लोगों को पीने का पानी भी पर्याप्त नहीं मिलता था , वहां इन्होंने अपनी श्रम शक्ति से 100000- एक लाख लीटर क्षमता वाले रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को बनाया जो तीन मंजिला है सचमुच अद्भुत अकल्पनीय है जो वर्ष 1976/ में बनकर तैयार हुआ था जब पूरी दुनिया रेन वाटर सिस्टम के बारे में सोच भी नहीं सकती थी
इस जलाशय का नाम इन्होंने अपनी माता के नाम सुखदेई_जलाशय से समर्पित किया, इतने सबके बावजूद ये रूके नहीं जब जमीन जल अपना है तो बगीचा भी अपना हो और इस मुहिम की पीछे इन्होंने अपने शाररिक श्रम से एक आदर्श बागवानी तैयार की जिसे अपने पिताजी के नाम पर समर्पित किया 

आज इनकी श्रम शक्ति का लोहा एक लघु फिल्म के जरिए पूरे भारतवर्ष ने माना है

पर्वतीय अंचल में पाए जाने वाले बहुउपयोगी पौधों में भीमल का नाम सबसे पहले आता है। यह पहाड़ों में खेतों के किनारे पर्याप्त संख्या में मिलता है। स्थानीय लोग भीमल को भीकू, भिमू, भियुल नाम से भी जानते हैं। इस पेड़ के हर हिस्से का उपयोग होता है। भीमल का बॉटनिकल नाम ग्रेवीया अपोजीटीफोलिया है। इसे वंडर ट्री भी कहते हैं। पेड़ की ऊंचाई 9 से 12 मीटर तक होती है।
हिमालयी क्षेत्र में 2000 मीटर की ऊंचाई तक पाए जाने वाले भीमल के पौधों की संख्या कम हो रही है। पहले इन पेड़ों को पशुओं के चारे के लिए ही लगाया जाता था। इसकी सदाबहार पत्तियों हर सीजन में जानवरों का चारा मिलता है। पहाड़ में पशुपालन घटने से लोग भीमल के पेड़ों का महत्व भी भूलने लगे हैं।
आयुर्वेदाचार्यों ने भीमल पर बड़ा शोध किया है। आयुष दर्पण पत्रिका ने बाकायदा भीमल के हर हिस्से की उपयोगिता पर अध्ययन किया और इसकी जानकारी आम लोगों को देने की कोशिश की। आयुर्वेद में एमडी डॉ. नवीन जोशी ने बताया कि भीमल दुधारू जानवरों के लिए सबसे भरोसेमंद चारा है। भीमल की सूखी और बारीक टहनियां चूल्हे की आग जलाने के काम में लाई जाती है। यह चीड़ के छिलके की तरह ज्वलनशील होते हैं। डॉ. जोशी बताते हैं कि भीमल की छाल को उबालकर गोमूत्र के साथ मिलाने से सूजन और दर्द वाली जगह पर सेंकने से तत्काल आराम मिलता है। भीमल की पत्तियां तो चारे के उपयोग में आती हैं, लेकिन उसकी पतली टहनियों से मजबूत रेशा निकलता है। भीमल से तैयार होने वाली रस्सी नमीरोधक होती है। इसकी छाल को कूटकर बालों को धोने वाला प्राकृतिक शैंपू बनाया जाता है। शिकाकाई में तो भीमल का मिश्रण होने लगा है। डॉ. जोशी कहते हैं कि भीमल का पेड़ हर प्रकार से उपयोगी है। अब राज्य सरकार ने इसके संरक्षण और प्रोत्साहन की योजना बनाई है, यदि लोग इस दिशा में काम करें तो यह वास्तव में आजीविका का नया जरिया बन सकता है।
भीमल के पेड़ों की संख्या घटना चिंताजनक

नगर के आसपास पहले बड़ी संख्या में भीमल के पेड़ थे। शहरीकरण के कारण जमीन बिकी और भीमल के पेड़ नष्ट कर दिए गए। अब नगरीय क्षेत्र में भीमल के पेड़ों की संख्या बहुत कम हो गई है। यह गंभीर चिंता का विषय है। अलबत्ता ग्रामीण अंचलों में भीमल के पेड़ मिलते हैं। लोग इनके व्यापक उपयोग की जानकारी नहीं रखते। इसे सिर्फ चारा प्रजाति का पौधा माना जाने लगा है।






न्यार नदी गढ़वाल की पवित्र नदी है जो गंगा की सहायक नदी भी है जिसका संगम गंगा से व्यासघाट में होता है 






ज्वाल्पा देवी मंदिर पश्चिमी न्यार के तट पर है और सतपुली भी इसके किनारे है 
बांघाट में पश्चिमी न्यार और पूर्वी न्यार का संगम है वहां से इसका नाम न्यार नदी पड़ जाता है 
यह नदी कई गांवो को जल उब्लब्ध कराती है 

दूधतोली से 94 किमी का सफर तय करती है नदी

नयार नदी और असगाड़ यानी रामगंगा समुद्रतल से 2600 मीटर ऊंचे स्थान राठ-दूधतोली से निकलती है। थोड़ा आगे चलकर इसकी दो पतली धाराएं बंट जाती हैं पूर्वी और पश्चिमी नयार में। दोनों लगभग 94 किलोमीटर का सफर तय करती हैं। सिद्धपीठ ज्वाल्पा देवी पश्चिमी नयार पर स्थित है। पूर्वी और पश्चिमी नयार नदियों का संगम सतपुली के निकट मटकोली में होता है। इस नदी को भागीरथी नदी तंत्र का हिस्सा माना जाता है। केदारखंड पुराण में भी इस नदी का उल्लेख है। व्यासचट्टी प्राचीनकाल में बदरीनाथ यात्रा का एक मुख्य पड़ाव रहा है। यहां से पैदल यात्री बदरीनाथ के दर्शन के लिए जाते थे। कहा जाता है कि कंडवाश्रम से होकर आने वाले पैदल यात्री भी व्यासचट्टी पहुंचते थे और फिर यहां से वे बदरीनाथ धाम जाते थे।



संगम स्थल व्यासघाट भी पूरी तरह उपेक्षित


इतना अहम स्थान होने के बावजूद व्यासघाट पूरी तरह से उपेक्षित है। किसी भी सरकार ने यहां की सुध नहीं ली। चाय की दुकान चला रहे नरेंद्र बिष्ट के अनुसार व्यासघाट में आधा दर्जन परिवार ही रह गये हैं और उनके लिए भी अब गुजारा चलाना मुश्किल है। उनके अनुसार प्राचीनकाल से ही प्रख्यात रहे व्यास चट्टी को धार्मिक पर्यटन से जोड़ा जाना चाहिए था, लेकिन अब कौन इसकी परवाह करता है?