पौड़ी गढ़वाल. उत्तराखंड (Uttarakhand) में पौड़ी गढ़वाल (Pauri Garhwal) जिले के कल्जीखाल ब्लॉक स्थित सांगुड़ा गांव के 83 वर्षीय किसान विद्यादत्त शर्मा पर बनी लघु फिल्म 'मोती बाग' (Moti Bagh) ऑस्कर (Oscar Award) के लिए नॉमिनेट की गई है. इससे पहले ये फिल्म केरल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म समारोह (International short film festival) में प्रथम पुरस्कार मिल चुका है.





उत्तराखंड की माटी की खुशबू अब अमेरिका से पूरी दुनिया में अपनी महक बिखेरेगी। पौड़ी गढ़वाल जिले के बुजुर्ग किसान की मेहनत पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मोतीबाग’ को ऑस्कर फिल्म महोत्सव में एंट्री मिलने का दावा किया गया है। ‘मोतीबाग’ अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित लॉस एंजलिस शहर में प्रदर्शित होगी। 



गंगा नदी भारत की करीब 43% जनसंख्या का बोझ अकेले उठाती है|  समूचे विश्व में गंगा ही एक ऐसी नदी है जिसका पानी कभी खराब नहीं होता| भारत के करीब आधी जनसंख्या का पालन-पोषण करने के बाद भी गंगा नदी की हमने ऐसी उपेक्षा की कि आज यह विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी है| उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा नदी को मानवीय अधिकार प्रदान किए जिससे गंगा का अस्तित्व बचा रह सके| गंगा नदी के मानवीकरण का जो कार्य न्यायालय ने अब किया है वही कार्य हमारे पूर्वज आज से हजारों वर्ष पहले ही कर चुके थे|
      हमारे पूर्वजों ने हमारी ऐसी संस्कृति विकसित की थी कि हमारे सारे रीति-रिवाजों, पर्व-त्योहारों, उत्सवों, व्रतों आदि का प्रकृति एक अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी| शायद ही कोई ऐसा व्रत हो जो तालब-नदी या पेड़-पौधों के बिना पूर्ण होता हो| शादी-विवाह में पनभरन की एक रस्म निभाई जाती है जिसमें ढोल-बाजे के साथ गीत गाते हुए कुएं या तालाब जैसे जलाशय पर जाकर मटके में पानी भरना होता है| इसके बाद आमौर ब्याहने की रस्म निभाई जाती है जिसमें इसी तरह से गाजे-बाजे के साथ आम के पेड़ के साथ शादी की जाती है|
      बात यह है कि हमारे पूर्वजों ने तो हर तरीके से हमें प्रकृति के साथ जोड़े रखने का प्रयास किया परंतु हम कभी समझ नहीं पाये जिसका परिणाम आज हमें भुगतना पड़ रहा है| तालाब और कुओं का महत्त्व हमने समझा होता तो आज भूमिगत जल-स्रोत इतना कम ना हुआ होता| पेड़ के महत्त्व को हमने समझा होता तो आज वायु-प्रदूषण की स्थिति इतनी भयावह न हुई होती|

ब्राजील / अमेजन के जंगलों में 6 साल की सबसे बड़ी आग, दुनिया की 20% ऑक्सीजन यहां पैदा होती है



ब्राजील में अमेजन के जंगलों में आग लगने की घटना रिकॉर्ड स्तर पर है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च के अनुसार बीते आठ महीने में 73,000 बार आग लगने की घटनाएं दर्ज हुईं।  2018 के मुकाबले इस बार ऐसी घटनाओं में 83% बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

 

2013 के बाद आग लगने का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। अधिकारियों के मुताबिक जंगलों में आग बीते दो-तीन सप्ताह से लगातार बढ़ रही है। ब्राजील ने इन घटनाओं पर महीने की शुरुआत में ही आपातकाल घोषित किया था।





कल रविवार को न्यूज़ीलैंड बनाम इंग्लैंड के फाइनल मतकग हुआ जिसमें दोनों का स्कोर 241 था
बाद में आई सी सी ने इंग्लैंड को विश्व कप का विजेता चुन लिया

गौरतलब है कि हर बार इंग्लैंड रनर अप में आ जाता था लेकिन
इस बार मुकाबला बराबरी का था
जिससे सुवर ओवर की वजह से इंग्लैंड जीत गया



सुपर ओवर के नियम


  • दोनों टीमें खेलेंगी छह-छह गेंदे
  • दोनों टीमें तीन बल्लेबाज़ों को इस्तेमाल कर सकती हैं
  • सबसे ज़्यादा स्कोर बनाने वाली टीम जीतेगी


सारांश

  1. न्यूज़ीलैंड को हराकर पहली बार विश्व चैंपियन बना इंग्लैंड
  2. बेहद रोमांचक रहा मैच सुपर ओवर तक खिंचा
  3. 23 साल बाद वनडे वर्ल्ड कप को मिला नया चैंपियन
  4. पिछले विश्वकप की उपविजेता है न्यूज़ीलैंड की टीम



















उत्तराखण्ड में जरूरतमंद लोगों और गंभीर से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए वरदान साबित हो रहे द हंस जरनल अस्पताल सतपुली में समाजसेवी माताश्री मंगलाजी एवं भोलेजी महाराज की प्रेरणा से 5 जुलाई से 7 जुलाई 2019 तक निःशुल्क स्त्री रोग जांच क्लिनिक का आयोजन किया गया। जिसमें नयारघाटी व दूर दराज के ग्रामीणों सहित हजारों की संख्या में पहुंचे स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य लाभ उठाया।

माताश्री मंगला जी एवं श्री भोले जी महाराज ने पहाड़ की महिलाओं के संघर्षों को बहुत करीब से जानते हैं । उन्हीं के मार्गदर्शन से  हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल में महिलाओं के लिए विशेष तौर पर इस शिविर का आयोजन किया था।
क्योंकि वो जानते हैं कि पहाड़ की महिलाओं का जीवन बहुत संघर्ष पूर्ण और जोखिम भरा होता है 
पहाड़ की नारी अपने खेत-खलिहानों और पशुओं के लिए अपना जीवन तक दाव पर लगा देती है। 
जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं आई और उन्होंने अपने स्वास्थ्य की जांच कराई। 

इस शिविर में खून, यूरीन, अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, सीटी स्कैन सहित निःशुल्क दवाइयों का वितरण भी किया गया। शिविर में चौबट्टाखाल, संगलाकोटी, रीठाखाल, एकेश्वर, सतपुली, बिलखेत, बडियूँ, कांसखेत, कल्जीखाल, पटीसैन, गवाना, दुधारखाल,ज्वालपा देवी और संतुधार  आदि ग्रामों से बड़ी संख्या में महिलाएं अपने स्वास्थ्य जांच के लिए पहुंची। इस मौके पर इन तमाम ग्रामों से आई महिलाओं ने द हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल में विशेष तौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य जांच के लिए इस शिविर का आयोजन करने के लिए माताश्री मंगला जी एवं श्री भोले जी महाराज और हंस फाउंडेशन जरनल अस्पताल के डाक्टर एवं सदस्यों का कोटि-कोटि आभार व्यक्त किया
श्रीमान_विध्यादत्त_शर्मा_उनियाल














वर्तमान की भौतिकवादी मानसिकता हर जन की गांव-समाज से विमुखता को दरकिनार करते हुए 83 वर्षीय वैचारिक नौजवान परम् आदरणीय विध्यादत्त शर्मा उनियाल सांगुड़ा कल्जीखाल विकास खंड ने श्रम-साधना की अवधारणा ,पर्यावरण संरक्षण और श्रम से निरोग रहने की महत्ता को जिस संजीदगी से प्रस्तुत किया है वो युगों-युगों तक इस आदम समाज को प्रेरणा देता रहेगा
इन्होंने उस क्षेत्र में अपनी जीवटता दिखाई जहां लोगों को पीने का पानी भी पर्याप्त नहीं मिलता था , वहां इन्होंने अपनी श्रम शक्ति से 100000- एक लाख लीटर क्षमता वाले रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को बनाया जो तीन मंजिला है सचमुच अद्भुत अकल्पनीय है जो वर्ष 1976/ में बनकर तैयार हुआ था जब पूरी दुनिया रेन वाटर सिस्टम के बारे में सोच भी नहीं सकती थी
इस जलाशय का नाम इन्होंने अपनी माता के नाम सुखदेई_जलाशय से समर्पित किया, इतने सबके बावजूद ये रूके नहीं जब जमीन जल अपना है तो बगीचा भी अपना हो और इस मुहिम की पीछे इन्होंने अपने शाररिक श्रम से एक आदर्श बागवानी तैयार की जिसे अपने पिताजी के नाम पर समर्पित किया 

आज इनकी श्रम शक्ति का लोहा एक लघु फिल्म के जरिए पूरे भारतवर्ष ने माना है

वर्तमान समय में ठंडे पानी की जगह फ्रीज ने लेली है
लेकिन आप नही जानते कि फ्रीज के पानी के स्वास्थ्य के लिए कई नुकसान हैं तो आपको मिट्टी के घड़े का पानी पीने की आदत दाल देनी चहिये



आईये जानते हैं मिट्टी के घड़े के पानी पीने के लाभ



मिट्टी के घड़े का पानी –
1 – घड़े का पानी है अमृत के समान
आज भी कई घरों में पीने के पानी को रखने के लिए मिट्टी के घड़े का इस्तेमाल किया जाता है. जो लोग घड़े के पानी की अहमियत को समझते हैं वो लोग आज भी उसी का पानी पीते हैं.
दरअसल मिट्टी में कई प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता पाई जाती है. इसलिए मिट्टी के घड़े का पानी हमें स्वस्थ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है.
2 – वात को नियंत्रित रखने में कारगर
गर्मियां आते ही लोग फ्रिज का पानी पीने लगते हैं. बर्फीला पानी पीने से कब्ज और गले की शिकायत हो सकती है. लेकिन मटके का पानी बहुत ज्यादा ठंडा नहीं होता है जिससे वात नियंत्रित रहता है. मटके का पानी गर्मी में शीतलता प्रदान करता है और इस पानी से कब्ज और गले की समस्या नहीं होती है.
3 – पाचन क्रिया को रखता है दुरुस्त
नियमित रुप से घड़े का पानी पीने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और पाचन क्रिया दुरुस्त होती है. जबकि प्लास्टिक की बोतलों में पानी स्टोर करने से उसमें प्लास्टिक से अशुद्धियां इकट्ठी हो जाती है. घड़े का पानी पीने से शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ जाता है.
4 – गले को ठीक रखने में मददगार
फ्रिज का बहुत ज्यादा ठंडा पानी गले और शरीर के अंगों को एकदम से ठंडा कर शरीर को बुरी तरह से प्रभावित करता है. इससे गले की कोशिकाओं का ताप अचानक गिर जाता है जिससे गला खराब हो जाता है. लेकिन घड़े का पानी पीने से गला अच्छा रहता है.
5 – गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद
गर्भवती महिलाओं को फ्रिज में रखे हुए ठंडे पानी को पीने से परहेज रखने की सलाह दी जाती है. उन्हें घड़े या सुराही का पानी पीने की सलाह दी जाती है. घड़े में रखा पानी गर्भवती महिलाओं की सेहत के लिए अच्छा होता है.
इस तरह से मिट्टी के घड़े का पानी फायदेमंद है – गौरतलब है कि मिट्टी में पानी को शुद्ध करने का खास गुण होता है जो पानी में मौजूद विषैले पदार्थों को सोख लेता है. घड़े में पानी सही तापमान पर रहता है जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. इसलिए फ्रिज का पानी पीने के बजाय मिट्टी के घड़े का पानी पीने की आदत डाल लेनी चाहिए.












पर्वतीय अंचल में पाए जाने वाले बहुउपयोगी पौधों में भीमल का नाम सबसे पहले आता है। यह पहाड़ों में खेतों के किनारे पर्याप्त संख्या में मिलता है। स्थानीय लोग भीमल को भीकू, भिमू, भियुल नाम से भी जानते हैं। इस पेड़ के हर हिस्से का उपयोग होता है। भीमल का बॉटनिकल नाम ग्रेवीया अपोजीटीफोलिया है। इसे वंडर ट्री भी कहते हैं। पेड़ की ऊंचाई 9 से 12 मीटर तक होती है।
हिमालयी क्षेत्र में 2000 मीटर की ऊंचाई तक पाए जाने वाले भीमल के पौधों की संख्या कम हो रही है। पहले इन पेड़ों को पशुओं के चारे के लिए ही लगाया जाता था। इसकी सदाबहार पत्तियों हर सीजन में जानवरों का चारा मिलता है। पहाड़ में पशुपालन घटने से लोग भीमल के पेड़ों का महत्व भी भूलने लगे हैं।
आयुर्वेदाचार्यों ने भीमल पर बड़ा शोध किया है। आयुष दर्पण पत्रिका ने बाकायदा भीमल के हर हिस्से की उपयोगिता पर अध्ययन किया और इसकी जानकारी आम लोगों को देने की कोशिश की। आयुर्वेद में एमडी डॉ. नवीन जोशी ने बताया कि भीमल दुधारू जानवरों के लिए सबसे भरोसेमंद चारा है। भीमल की सूखी और बारीक टहनियां चूल्हे की आग जलाने के काम में लाई जाती है। यह चीड़ के छिलके की तरह ज्वलनशील होते हैं। डॉ. जोशी बताते हैं कि भीमल की छाल को उबालकर गोमूत्र के साथ मिलाने से सूजन और दर्द वाली जगह पर सेंकने से तत्काल आराम मिलता है। भीमल की पत्तियां तो चारे के उपयोग में आती हैं, लेकिन उसकी पतली टहनियों से मजबूत रेशा निकलता है। भीमल से तैयार होने वाली रस्सी नमीरोधक होती है। इसकी छाल को कूटकर बालों को धोने वाला प्राकृतिक शैंपू बनाया जाता है। शिकाकाई में तो भीमल का मिश्रण होने लगा है। डॉ. जोशी कहते हैं कि भीमल का पेड़ हर प्रकार से उपयोगी है। अब राज्य सरकार ने इसके संरक्षण और प्रोत्साहन की योजना बनाई है, यदि लोग इस दिशा में काम करें तो यह वास्तव में आजीविका का नया जरिया बन सकता है।
भीमल के पेड़ों की संख्या घटना चिंताजनक

नगर के आसपास पहले बड़ी संख्या में भीमल के पेड़ थे। शहरीकरण के कारण जमीन बिकी और भीमल के पेड़ नष्ट कर दिए गए। अब नगरीय क्षेत्र में भीमल के पेड़ों की संख्या बहुत कम हो गई है। यह गंभीर चिंता का विषय है। अलबत्ता ग्रामीण अंचलों में भीमल के पेड़ मिलते हैं। लोग इनके व्यापक उपयोग की जानकारी नहीं रखते। इसे सिर्फ चारा प्रजाति का पौधा माना जाने लगा है।
जैसे की आप जानते हैं की प्रोटीन शरीर के लिए सबसे आवश्यक तत्व है

आएये जानते है प्रोटीन के बारें में



एक नए शोध के अनुसार यह बात सामने आई है कि शरीर के लिये प्रोटीन सबसे आवश्‍यक तत्‍व है। प्रोटीन त्वचा, रक्त, मांसपेशियों तथा हड्डियों की कोशिकाओं के विकास के लिए आवश्यक होते हैं।



जानिए प्रोटीन के लाभ


मसल्‍स बनाने में मददगार


मसल्‍स बनाने में मददगार प्रोटीन का सबसे बड़ा लाभ है कि यह शरीर में मसल्‍स बनाने में मदद करता है।


वजन घटाए


वजन घटाए प्रोटीन पचाने में अधिक समय लगता है। जिससे ज्‍यादा मात्रा में कैलोरी बर्न होती है। पेट अधिक समय तक भरा रहेगा तो इससे आपको कम खाने और वजन कम करने में सहायता मिलेगी।


हड्डी मजबूत बनें


हड्डी मजबूत बनें प्रोटीन हड्डियों, लिगामेंट्स और दूसरे संयोजी ऊतकों को स्वस्थ रखने के लिए भी जाना जाता है। प्रोटीन की कमी से हड्डियां और ऊतक कमजोर, कड़े और आसानी से टूटने वाले हो जाते हैं।


शरीर की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखे


शरीर की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखे प्रोटीन को डाइट में लेने से शरीर की कार्यप्रणाली दुरुस्‍त होती है। यह एनर्जी प्रदान करता है, इम्‍यून को शक्‍ती देता है तथा शरीर से गंदगी निकालता है। इसे खाने से भूख भी कंट्रोल रहती है।


बालों और त्‍वचा के लिये


बालों और त्‍वचा के लिये यह हमारी त्‍वचा और बालों के लिये भी अच्‍छा होता है। बालों और नाखूनों में केराटिन नामक प्रोटीन होता है। यह बालों को मजबूत, लचीला और चमकदार बनाता है। बालों, त्वचा और नाखूनों को स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन खाएं।


बच्‍चों की ग्रोथ के लिये


बच्‍चों को भी एक बैलेंस डाइट लेनी चाहिये, जिसमें अच्‍छी मात्रा में विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्‍स और एनर्जी के लिये कार्बोहाइड्रेट्स होने चाहिये।


दिमागी सेहत बढ़ाए


दिमागी सेहत बढ़ाए जब डाइट में प्रोटीन युक्‍त आहार बढ़ाए जाते हैं तो ब्रेन काफी एक्‍टिव हो जाता है। आपके ब्रेन की एक्‍टिविटी आपके आहार पर निर्भर रहती है।


शरीर की ताकत बढाए


यह आपको ऊर्जा देता है। इसलिये अपने आहार में अंडे, बींस, दालें, मीट आदि को शामिल करना ना भूलें।



नीचे दिए लिंक से आप प्रोटीन मंगवा सकते हैं 


https://www.lybrate.com/nestle-resource-protein-400g-vanilla/p/pac_nestleresource400gtin



















न्यार नदी गढ़वाल की पवित्र नदी है जो गंगा की सहायक नदी भी है जिसका संगम गंगा से व्यासघाट में होता है 






ज्वाल्पा देवी मंदिर पश्चिमी न्यार के तट पर है और सतपुली भी इसके किनारे है 
बांघाट में पश्चिमी न्यार और पूर्वी न्यार का संगम है वहां से इसका नाम न्यार नदी पड़ जाता है 
यह नदी कई गांवो को जल उब्लब्ध कराती है 

दूधतोली से 94 किमी का सफर तय करती है नदी

नयार नदी और असगाड़ यानी रामगंगा समुद्रतल से 2600 मीटर ऊंचे स्थान राठ-दूधतोली से निकलती है। थोड़ा आगे चलकर इसकी दो पतली धाराएं बंट जाती हैं पूर्वी और पश्चिमी नयार में। दोनों लगभग 94 किलोमीटर का सफर तय करती हैं। सिद्धपीठ ज्वाल्पा देवी पश्चिमी नयार पर स्थित है। पूर्वी और पश्चिमी नयार नदियों का संगम सतपुली के निकट मटकोली में होता है। इस नदी को भागीरथी नदी तंत्र का हिस्सा माना जाता है। केदारखंड पुराण में भी इस नदी का उल्लेख है। व्यासचट्टी प्राचीनकाल में बदरीनाथ यात्रा का एक मुख्य पड़ाव रहा है। यहां से पैदल यात्री बदरीनाथ के दर्शन के लिए जाते थे। कहा जाता है कि कंडवाश्रम से होकर आने वाले पैदल यात्री भी व्यासचट्टी पहुंचते थे और फिर यहां से वे बदरीनाथ धाम जाते थे।



संगम स्थल व्यासघाट भी पूरी तरह उपेक्षित


इतना अहम स्थान होने के बावजूद व्यासघाट पूरी तरह से उपेक्षित है। किसी भी सरकार ने यहां की सुध नहीं ली। चाय की दुकान चला रहे नरेंद्र बिष्ट के अनुसार व्यासघाट में आधा दर्जन परिवार ही रह गये हैं और उनके लिए भी अब गुजारा चलाना मुश्किल है। उनके अनुसार प्राचीनकाल से ही प्रख्यात रहे व्यास चट्टी को धार्मिक पर्यटन से जोड़ा जाना चाहिए था, लेकिन अब कौन इसकी परवाह करता है?









कुछ दिन पहले एक खबर आई थी। पिथौरागढ़ से 13 साल की अंजलि पंत गायब हो गई थी। खबर आई थी कि अंजलि 3 मार्च को पास के जंगल में जानवरों को चराने गई थी। तबसे अंजलि वापस नहीं लौटी तो सोशल मीडिया पर सिस्टम को लेकर सवाल उठने लगे थे। अब अच्छी खबर ये है कि अंजलि वापस आ गई है। समाजसेवी रोशन रतूड़ी ने अपने फेसबुक पेज के माध्यम से खबर दी कि अंजलि का अपहरण किया गया था और उसे पुलिस की लगातार कोशिशों के बाद वो बरेली में सुरक्षित मिली। यहां सबसे बड़ा सवाल जो खड़ा होता है...वो शब्द है ‘अपहरण’? आज अंजलि सकुशल घर लौट आई, लेकिन ऐसी कितनी अंजलि हैं, जिन पर अपहरणकर्ताओं की नज़र है? क्या सच में पहाड़ में बेटियां सुरक्षित नहीं रह गईं हैं ? सवाल इसलिए भी क्योंकि पिथौरागढ़ से अंजलि लापता हुई थी और बरेली में जाकर मिली है।

अगर ये वास्तव में अपहरण था, तो इस बात को ऐसे ही जाने नहीं दिया जा सकता। पहाड़ में बेटियों की सुरक्षा बेहद जरूरी है और इसके लिए पुलिस विभाग को सतर्क रहने की काफी जरूरत है। हम उत्तराखंड पुलिस को बधाई देना चाहते हैं कि आप अंजलि को वापस ले आए लेकिन इसके साथ साथ ये भी जरूरी है कि उस सिंडिकेट का पता लगाया जाए, जो पहाड़ में बेटियों के अपहरण की साजिश रच रहा है। सवाल सुरक्षा का है और बेहद जरूरी भी...इसलिए सावधानी में ही सुरक्षा है।







उत्तराखंड के लोगों ने किसी की मदद के लिए हमेशा दिल खोलकर हाथ बढ़ाए हैं। एक बार फिर से आपकी जरूरत  है। एक पिता को अपनी बेटी की तलाश है, जो जानवरों को चराने के लिए पास के जंगल में गई थी लेकिन तबसे वापस नहीं लौटी। 13 साल की अंजलि पंत पिथौरागढ़ मकी रहने वाली हैं। उनके पिता का नाम विशन पंत है। बताया जा रहा है कि अंजलि 3 मार्च को पास के जंगल में जानवरों को चराने गई थी। तबसे अंजलि वापस नहीं लौटी है। जिस बेटी की हंसी से घर आंगन में खुशियां रहती थीं, आज वो घर सूना पड़ा है। माता-पिता अंजलि की तलाश में दर दर भटक रहे हैं। गांव के सभी लोग परेशान हैं और अंजलि की खोजबीन में लगे हैं। पुलिस को इस बात की खबर दे दी गई है और पुलिस भी अंजलि की तलाश में जुटी है। सभी के दिल में बस ये ही दुआ है कि अंजलि जहां भी हो, सही सलामत हो।


गांव वाले भी लगातार तलाश में जुटे हैं लेकिन कुछ भी पता नहीं लग पा रहा है। सोशल मीडिया पर लगातार मुहिम चल रही है कि अंजलि के परिवार की मदद करें। उधर समाजसेवी रोशन रतूड़ी ने भी कहा है कि अंजलि के परिवार की मदद करें, उन्होंने अंजलि का पता लगाने वाले को ईनाम देने की घोषणा की है। उन्होंने लिखा हबै कि अगर आपको अंजलि का पता चलता है, तो (+971-5040-91-945) पर संपर्क करें। वास्तव में 13 साल की बच्ची को आपकी मदद की दरकार है, उस बेटी के परिवार पर क्या बीत रही होगी, ये उन माता-पिता से बेहतर कोई जानता, जिन्होंने नाजों से अपनी बेटी का पालन-पोषण किया था। थक-हार कर परिवार वालों नें पुलिस में गुमशुदगी होने की रिपोर्ट दर्ज करा दी है । उतराखंड पुलिस भी रात-दिन अपनी तरफ से पूरी तरह से खोजबीन मे लगी है।


उत्तराखंड की इस मासूम बिटीया का पता लगाने के लिए , ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करै, और इंसानियत के लिए इस मासूम बेटी को ढूँढने मैं मदद करें ।
इस मासूम बिटीया का पता बताने वाले को मेरी तरफ से 25,000 रूपये नगद इनाम दिया जायेगा ।
नाम अंजली पतं ,उम्र-13 वर्ष , पिता का नाम-विशन पतं ,जिला-पिथौरागढ उतराखंड, ये मासूम बिटीया अंजली पतं 3 मार्च को जानवरों को चराने के लिए पास के जंगल में गयी थी ,परंतु जंगल से लौटकर घर नहीं आई । अंजलि के माता-पिता बेटी की तलाश मे जगह-जगह भटक रहे हैं, रो-रो कर बुरा हाल है ।गाँव के सभी लोग बहुत परेशान है सभी ने काफ़ी खोजबीन की परंतु, अभी तक अंजली पतं का कोई पता नहीं लग पाया है ।
जब कहीं भी मासूम अंजलि का पता नहीं लगा पाया आखिर मै परिवार वालों नें पुलिस में गुमशुदगी होने की रिपोर्ट दर्ज करा दी है । उतराखंड पुलिस भी रात-दिन अपनी तरफ से पूरी तरह से खोजबीन मे लगी है ।
भगवान करें ये मासूम बेटी जहाँ कहीं भी हो सकुशल हो । जिस किसी सज्जन को इस बिटीया का पता लगे तुरंत मुझे नीचे लिखे इस नंबर पर सम्पर्क करै । ( +971-5040-91-945)
आपका सेवक
रोशन रतूडी ( Social Activist)
RR Humanity-1st Dev Bhoomi Uttrakhand

उत्तराखंड में एक जंगली और कंटीली झाड़ी पर छोटे-छोटे बैंगनी फल लगते हैं, जिन्हें बच्चे बड़े चाव से खाते हैं। किलमोड़ा कहे जाने वाले इस फल को आम तौर पर लोग उपेक्षित ही करते हैं और इस पौधे को अपने खेतों से हटा देते हैं। लेकिन अब इसी उपेक्षित कंटीली झाड़ी से दुनियाभर में जीवन रक्षक दवाएं तैयार हो रही हैं।
जड़ी-बूटी के उत्पादन व संरक्षण में जुटे बागेश्वर के एक ग्रामीण ने किलमोड़ा की झाड़ियों से तेल तैयार किया है। खास बात यह है कि शुद्धता के कारण यह तेल लखनऊ की दवा बनाने वाली एक कंपनी को बेहद पसंद आया है।
वनस्पति विज्ञान में ब्रेवरीज एरिस्टाटा को पहाड़ में किलमोड़ा के नाम से जाना जाता है। इसकी करीब 450 प्रजातियां दुनियाभर में पाई जाती हैं। भारत, नेपाल, भूटान और दक्षिण-पश्चिम चीन सहित अमेरिका में भी इसकी प्रजातियां हैं।
किलमोड़ा का पूरा पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है। इसकी जड़, तना, पत्ती, फूल और फलों से विभिन्न बीमारियों में उपयोग आने वाली दवाएं बनाई जाती हैं। मुख्य रूप से इस पौधे में एंटी डायबिटिक, एंटी ट्यूमर, एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरल तत्व पाए जाते हैं। मधुमेह (डायबिटीज) के इलाज में इसका सबसे अधिक उपयोग होता है।